आक़ा मौला ने चेन्नई में फरमाई मुहर्रम 1447 हिजरी की मजलिसें, लेकिन बरकत और करम की बारिश हुई मालवा पर

रिपोर्ट इब्राहीम बोहरा
नीमच। इस वर्ष मुहर्रम-उल-हराम 1447 हिजरी की मजलिसें दाऊदी बोहरा समुदाय के 53वें धर्मगुरु हिज़ होलीनेस सैयदना मुफद्दल सैफुद्दीन साहब द्वारा चेन्नई से फरमाई गई। चेन्नई जैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक नगर को मजलिसों की मेज़बानी देना, अपने आप में एक बड़ी इनायत है। लेकिन सबसे खास बात यह है कि भले ही मजलिसें चेन्नई में हो रही थी, लेकिन उनके लाइव रिले के लिए बनाए गए 23 भारतीय केंद्रों में से 12 रिले केंद्र अकेले मालवा क्षेत्र में स्थित थे।
यह केवल संयोग नहीं, बल्कि एक साफ़ इशारा है कि सैयदना साहब की नज़र-ए-करम मालवा पर ख़ास तौर पर है।

कर्बला की शहादत — हक़, सब्र और कुर्बानी की बुलंद मिसाल
मुहर्रम केवल तारीखों का नाम नहीं, बल्कि कर्बला की सरज़मीं पर इंसाफ़ और इंसानियत की वो आवाज़ है, जिसने हमेशा के लिए हक़ और बातिल को अलग कर दिया। 10 मुहर्रम 61 हिजरी को इमाम हुसैन अ.स. ने अपने परिवार, जिसमें छोटे बच्चे अली असग़र, जवान बेटे अली अकबर, भाई अब्बास और दर्जनों अहले-बैत शामिल थे, को अल्लाह की राह में कुर्बान कर दिया।
उन्होंने प्यास, भूख, तकलीफ और तनहाई के बावजूद यज़ीद की बैत से इनकार किया और सदा फरमाया:
“मौत की गोद में जाना बेहतर है, बजाय ज़ालिम के हाथ में हाथ देने के।”

मालवा में 12 रिले सेंटर्स, मौला के करम की नज़र
जब चेन्नई से मजलिसें रिले हो रही थी और उन्हें सुनने के लिए भारतभर में 23 रिले सेंटर्स बनाए गए थे, तो यह जानकर गर्व होता है कि उनमें से 12 अकेले मालवा क्षेत्र में थे, जिसमें इंदौर / महू, उज्जैन, रतलाम, देवास, शाजापुर, आलोट, जावरा, बड़नगर, खाचरौद, सैलाना, बेटमा और सारंगपुर शामिल है। 
सैयदना साहब की रहमत मालवा पर क्यों?
मालवा! जो मध्य प्रदेश का ऐतिहासिक, कृषि प्रधान और तहज़ीब से भरपूर क्षेत्र है, हमेशा बोहरा समाज की वफादारी, खिदमत और इल्मी तरक्की का केंद्र रहा है। जैसा की 7 वर्ष पूर्व इंदौर की मुहर्रम की मेज़बानी में देखा गया था कि यह क्षेत्र मजलिसों और मस्जिदों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है और दीनी तालीम में हमेशा आगे रहा है, यहाँ का बोहरा समुदाय भी नेक कामों में खरचने के लिए प्रसिद्ध है। 

मालवा के मोअम्मिनीन सैयदना मुफद्दल सैफुद्दीन साहब की नज़रों में खास मुक़ाम रखते हैं, यह करम भी है, और यह जिम्मेदारी भी है, कि हम वफ़ादारी, सब्र और खिदमत के उस रास्ते पर कायम रहें जो कर्बला में इमाम हुसैन अ. स. और उनके अहले बैत व असहाब ने दिखाया और सैयदना साहब ने सिखाया।

एक टिप्पणी भेजें

और नया पुराने