नीमच। भारत में नए राज्यों की मांग कोई नई बात नहीं है, चाहे वह तेलंगाना हो, गोरखालैंड, विदर्भ या हरित प्रदेश, हर क्षेत्रीय आंदोलन की अपनी सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पृष्ठभूमि रही है। मध्य भारत में भी दो अलग-अलग राज्य निर्माण की मांगें उभर रही हैं जिसमें पहली है "भील प्रदेश", जो मुख्यतः आदिवासी पहचान और अधिकारों पर आधारित है, और दूसरी ओर है "मालवा राज्य", जो सांस्कृतिक-भाषाई और आर्थिक आधारों पर प्रस्तावित है। इस लेख में हम इन दोनों मांगों का तुलनात्मक विश्लेषण करेंगे ताकि यह समझा जा सके कि किस विकल्प को व्यापक जनसमर्थन, राजनीतिक स्वीकार्यता और प्रशासनिक व्यवहार्यता मिल सकती है।
जनसमर्थन: सीमित बनाम समावेशी -
भील प्रदेश की मांग मुख्यतः भील जनजाति पर केंद्रित है, जो एक विशिष्ट सामाजिक समूह है और इस कारण इसका जनाधार सीमित रहता है और केवल आदिवासी क्षेत्रों तक सिमट कर रह जाता है जबकि वहीं मालवा राज्य की मांग में एक व्यापक जनसमूह की भागीदारी देखी जा सकती है जिसमें आदिवासी, ओबीसी, सामान्य वर्ग, व्यापारी, किसान, और शहरी मध्यवर्ग तक शामिल हैं। जहां भील प्रदेश का आधार अधिकतर ग्रामीण और वनवासी क्षेत्र हैं, वहीं मालवा राज्य के प्रस्ताव में इंदौर, उज्जैन, देवास, मंदसौर जैसे शहरी और औद्योगिक केंद्र भी आते हैं, जिससे इसका सामाजिक और भौगोलिक प्रभाव क्षेत्र बड़ा हो जाता है।
राजनीतिक समर्थन: मतदाता आधार का महत्व -
राजनीतिक दृष्टि से भील प्रदेश की मांग आदिवासी वोट बैंक तक सीमित रहने के कारण केवल कुछ दलों जैसे भारत आदिवासी पार्टी आदि के लिए प्राथमिकता बनती है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां आदिवासी सीटें निर्णायक होती हैं लेकिन मालवा राज्य की मांग में मतदाताओं का विविध और घना समूह है, जो किसी भी राजनीतिक दल के लिए आकर्षक बन सकता है। इसके अलावा, भील प्रदेश की मांग को कभी-कभी ‘अलगाववादी’ नज़रिये से देखा जाता है, जबकि मालवा राज्य की मांग को प्रशासनिक कुशलता, क्षेत्रीय संतुलन और विकास के दृष्टिकोण से अधिक स्वीकार्यता मिल सकती है।
भूगोल और आर्थिक दृष्टिकोण -
आर्थिक आधार पर भील प्रदेश अपेक्षाकृत कमजोर दिखाई देता है, उसके क्षेत्रों में जंगल, खनिज और जल स्रोत तो हैं, लेकिन आधारभूत संरचना का घोर अभाव है जबकि दूसरी ओर, मालवा क्षेत्र कृषि, व्यापार, शिक्षा और उद्योगों में पहले से विकसित है। इंदौर जैसे शहर न केवल मध्य भारत की व्यापारिक राजधानी माने जाते हैं, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा और परिवहन जैसी सेवाओं का भी बड़ा केंद्र हैं, इसलिए मालवा राज्य का आर्थिक आत्मनिर्भरता का दावा अधिक ठोस लगता है।
सांस्कृतिक और पहचान आधारित पहलू -
सांस्कृतिक रूप से भील प्रदेश की पहचान विशेष रूप से आदिवासी परंपराओं और लोकगाथाओं तक सीमित है, इससे गैर-भील समुदायों के लिए इस पहचान से जुड़ना कठिन हो जाता है किन्तु इसके विपरीत, मालवा क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान अधिक समावेशी और ऐतिहासिक है। मालवी भाषा, महाकाल की परंपरा, सांस्कृतिक उत्सव, लोकनाट्य और स्थापत्य ये सब मिलकर मालवा को एक संपूर्ण सांस्कृतिक इकाई बनाते हैं, जिससे क्षेत्र के अधिकांश निवासी एक समान अपनापन महसूस करते हैं।
कौन-सी मांग ज्यादा व्यवहारिक?
जब हम राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक पहलुओं का समग्र मूल्यांकन करते हैं, तो स्पष्ट होता है कि "मालवा राज्य" की मांग अधिक व्यापक, समावेशी और व्यवहारिक है। भील प्रदेश की मांग, भले ही ऐतिहासिक अन्याय और अधिकारों की दृष्टि से तर्कसंगत हो, परंतु उसका जनाधार सीमित और प्रशासनिक संरचना कमजोर है। इसके विपरीत, मालवा राज्य की मांग राजनीतिक दलों के लिए भी आकर्षक हो सकती है क्योंकि इससे उन्हें व्यापक मतदाता वर्ग तक पहुंचने का अवसर मिलेगा।